यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स के संस्थापक प्रो. डॉ. अनिल नौसरान ने कहा है कि भारत में एलोपैथिक दवाओं के प्रचार-प्रसार और वितरण को लेकर कठोर नियामक कदम उठाए जाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने चेताया कि फार्मा कंपनियाँ अब केवल एलोपैथिक चिकित्सकों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सा पद्धति के चिकित्सकों को भी प्रभावित कर रही हैं। यह प्रवृत्ति जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
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डॉ. नौसरान ने कहा कि एलोपैथिक दवाओं का सुरक्षित उपयोग तभी संभव है जब चिकित्सक फार्माकोलॉजी, दुष्प्रभाव, औषधि-परस्पर क्रियाएँ, खुराक और इलाज की अवधि का गहन ज्ञान रखते हों। अन्य चिकित्सा पद्धतियों की पढ़ाई में यह विषय शामिल नहीं होते, इसलिए गैर-एलोपैथिक चिकित्सकों द्वारा एलोपैथिक दवाओं का प्रयोग अवैज्ञानिक और असुरक्षित है।
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दुष्परिणाम
एंटीबायोटिक प्रतिरोध (Antibiotic Resistance): गलत और अंधाधुंध उपयोग से संक्रमणों का इलाज कठिन हो रहा है।
दवा जनित विषाक्तता और अंगों की विफलता: गलत खुराक से गुर्दा, यकृत और हृदय को स्थायी नुकसान हो रहा है।
जनस्वास्थ्य पर खतरा: मरीज असुरक्षित इलाज का शिकार होकर और गंभीर बीमारियों में फंस रहे हैं।
डॉ. नौसरान ने कहा, “हर एलोपैथिक दवा विष है। इसका लाभ तभी है जब योग्य एलोपैथिक चिकित्सक द्वारा विवेकपूर्ण ढंग से दी जाए। गलत उपयोग जानलेवा साबित हो सकता है।
मांगें
कठोर प्रतिबंध: फार्मा कंपनियों के प्रतिनिधि केवल एलोपैथिक डॉक्टरों तक ही सीमित रहें।
नियमन और जवाबदेही: गैर-एलोपैथिक चिकित्सकों को एलोपैथिक दवाओं का प्रचार करने वाली कंपनियों पर कार्रवाई हो।
जागरूकता और प्रशिक्षण: जनता और चिकित्सकों को अवैज्ञानिक दवा उपयोग के खतरों से अवगत कराया जाए।
स्पष्ट नीति: सरकार दिशा-निर्देश जारी करे कि एलोपैथिक दवाएँ केवल योग्य एलोपैथिक चिकित्सक ही लिख सकते हैं।
यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स का स्पष्ट मत है कि मरीजों का स्वास्थ्य वाणिज्यिक हितों से ऊपर होना चाहिए। एलोपैथिक दवाओं का विवेकपूर्ण और वैज्ञानिक उपयोग चिकित्सकीय आवश्यकता ही नहीं, बल्कि चिकित्सकों का नैतिक दायित्व है।
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