‘मुगल-ए-आजम’ के पीछे छुपा किस्सा: 1945 में शुरू हुई थी शूटिंग, 10 ट्रकों में कबाड़ बनकर बिक गया था सामान

मुंबई, एनआईए डेस्क।

हिंदी सिनेमा की पहचान मानी जाने वाली फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ को रिलीज हुए 65 साल से ज्यादा हो चुके हैं। लेकिन शायद कम ही लोग जानते हैं कि यह फिल्म दो बार बनाई गई थी।

डायरेक्टर के आसिफ का ड्रीम प्रोजेक्ट रही यह फिल्म पहली बार 1945 में शुरू हुई थी, जब भारत आजाद भी नहीं हुआ था। उस समय प्रोड्यूसर सिराज अली हाकिम इस फिल्म को फंड कर रहे थे। शूटिंग बॉम्बे टॉकीज में हो रही थी और करीब एक चौथाई हिस्सा फिल्माया भी जा चुका था। लेकिन 1947 के बंटवारे के बाद प्रोड्यूसर पाकिस्तान चले गए, और फिल्म अधूरी रह गई।

आसिफ का सपना टूटा

फिल्म बंद होने से न सिर्फ मेकर्स को नुकसान हुआ बल्कि डायरेक्टर के आसिफ का सपना भी चकनाचूर हो गया। एक्ट्रेस दुर्गा खोटे, जिन्होंने बाद में ‘मुगल-ए-आजम’ में जोधाबाई का रोल निभाया, ने अपनी बायोग्राफी में इस अधूरी फिल्म का जिक्र किया है।

उन्होंने लिखा कि दो साल बाद उस अधूरी फिल्म का शूट किया गया स्टॉक कबाड़ में बेच दिया गया। इतना सामान था कि उसे 10 ट्रकों में भरकर ले जाया गया। इनमें आर्टिफिशियल ज्वेलरी, कॉस्ट्यूम्स और लकड़ी का भारी सेट-सामान शामिल था।

दूसरी बार बनी ‘मुगल-ए-आजम’

सालों बाद के आसिफ ने अपने सपने को फिर से शुरू किया और इस बार फिल्म के चेहरे बने दिलीप कुमार और मधुबाला। दिलचस्प बात यह रही कि दोनों वर्ज़न में सिर्फ एक ही एक्ट्रेस थीं – दुर्गा खोटे, जो पहले अधूरे प्रोजेक्ट का भी हिस्सा रही थीं और बाद में क्लासिक ‘मुगल-ए-आजम’ में भी नज़र आईं।

आसिफ की यह मेहनत रंग लाई और 1960 में रिलीज हुई ‘मुगल-ए-आजम’ आज भी भारतीय सिनेमा का स्वर्णिम अध्याय मानी जाती है।

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