गोमती पुस्तक महोत्सव के तीसरे दिन बच्चों से लेकर साहित्य और संस्कृति प्रेमियों तक के लिए विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। लखनऊ विश्वविद्यालय के स्पोर्ट्स ग्राउंड में चल रहे राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के पांचवें गोमती पुस्तक महोत्सव में चिल्ड्रन्स कॉर्नर में कहानी, माइंडफुलनेस, कला, रचनात्मकता और डिजिटल पठन से जुड़े कार्यक्रमों ने बच्चों को आकर्षित किया। शहर के विभिन्न विद्यालयों से पहुंचे 1,300 से अधिक विद्यार्थियों ने कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया।
दिन की शुरुआत ‘कामिशिबाई स्टोरीटेलिंग सेशन’ से हुई। कहानीकार रंजीता सचदेवा ने बच्चों को जापान की पारंपरिक ‘पेपर थिएटर’ शैली से परिचित कराया। कहानी और चित्रों के माध्यम से बच्चों को कहानी कहने के इस अनूठे अंदाज की जानकारी दी गई।

इसके बाद कहानीकार और कम्युनिकेशन कोच प्रियंका सागर ने ‘माइंडफुलनेस फॉर क्यूरियस माइंड्स’ सत्र में बच्चों को वर्तमान क्षण के प्रति सजग रहने के तरीके बताए। उन्होंने बच्चों को अपनी भावनाओं, विचारों और खुशियों को समझने के लिए प्रेरित किया।
कबाड़ से बच्चों ने बनाई आकर्षक कलाकृतियां
‘वेस्ट टू वंडर वर्कशॉप’ में कलाकार सुग्रीव विश्वकर्मा के मार्गदर्शन में बच्चों ने बेकार समझी जाने वाली सामग्री से आकर्षक कलाकृतियां तैयार कीं। इस गतिविधि ने बच्चों में रचनात्मकता के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश भी दिया।
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वहीं राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय (ReP) के ओरिएंटेशन कार्यक्रम में विद्यार्थियों को डिजिटल पठन की दुनिया से परिचित कराया गया। उन्हें बताया गया कि राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय पर 23 भाषाओं में 7,000 से अधिक ई-पुस्तकें उपलब्ध हैं। प्रश्नोत्तरी में बेहतर प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय की विशेष उपहार सामग्री भी प्रदान की गई।
‘मंकी माइंड’ को ‘मॉन्क माइंड’ बनाने पर चर्चा
महोत्सव के साहित्यिक सत्र में युवा लेखक अर्नव शुक्ला की पुस्तक ‘Living Like A Monk: A Journey to Solve the Mind’ पर विशेष संवाद आयोजित किया गया। अर्नव ने युवाओं से मानसिक शांति, आत्मअनुशासन और आध्यात्मिकता के व्यावहारिक पहलुओं पर बातचीत की।
सत्र का समन्वय पं. दीनदयाल उपाध्याय राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजाजीपुरम के समाजशास्त्र विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नेहा जैन ने किया।
अर्नव शुक्ला ने कहा कि आज का मन लगातार सूचनाओं, विचारों और चिंताओं से घिरा हुआ है। ऐसे माहौल में आत्मचिंतन, अनुशासन और जागरूकता के जरिए ‘Monkey Mind’ को ‘Monk Mind’ की दिशा में ले जाया जा सकता है।
उन्होंने जर्नलिंग, ध्यान, मंत्र, सकारात्मक affirmation, visualisation और अच्छी संगति को मानसिक संतुलन के लिए उपयोगी बताया। उनका कहना था कि ‘Monk’ होना कोई अंतिम मंजिल नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली यात्रा है।
आर्थिक स्वतंत्रता के बिना महिला की अस्मिता अधूरी
महोत्सव के एक अन्य साहित्यिक सत्र में ‘अस्मिता का आर्थिक पक्ष’ विषय पर चर्चा हुई। लेखिका और महिला वित्त साक्षरता पर लेखन करने वाली आरती गुप्ता ने महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, बचत, निवेश, संपत्ति निर्माण और आर्थिक निर्णयों में उनकी भागीदारी पर विचार रखे। सत्र का समन्वय डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी ने किया।

संवाद में कहा गया कि महिला सशक्तिकरण केवल आय अर्जित करने तक सीमित नहीं है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने का अर्थ अपने आर्थिक फैसले खुद लेना, बचत और निवेश को समझना तथा अपने नाम पर संपत्ति का निर्माण करने की क्षमता भी है।
विवाह और आर्थिक सुरक्षा के संबंध, महिलाओं की वित्तीय स्वतंत्रता को लेकर सामाजिक धारणाओं और परिवार के आर्थिक निर्णयों में महिलाओं की बराबर भागीदारी जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
आरती गुप्ता की पुस्तक ‘I Am My Own Laxmi’ के संदर्भ में महिलाओं को अपनी आर्थिक पहचान मजबूत करने और भविष्य की वित्तीय सुरक्षा के लिए जागरूक रहने का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के हिंदी संपादक डॉ. ललित किशोर मंडोरा ने न्यास की परंपरा के अनुसार आमंत्रित अतिथियों को पुस्तकें और शाल भेंट कर सम्मानित किया।
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बिरजू महाराज कथक संस्थान की सांस्कृतिक संध्या ने बांधा समां
महोत्सव के सांस्कृतिक कार्यक्रम में शाम को बिरजू महाराज कथक संस्थान, लखनऊ की ओर से विशेष सांस्कृतिक संध्या आयोजित की गई। कलाकारों और विद्यार्थियों ने शास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत और कथक की प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत भगवान गणेश की स्तुति से हुई। इसके बाद ऋतु-राग, भक्ति, ब्रज-संस्कृति और गजल से जुड़ी प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया।
वर्षा ऋतु की छटा को राग मियां मल्हार में ‘बिजुरी चमके’ के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। इसके बाद कथक की प्रस्तुति में ‘बरसन लागी रे बदरिया’ बंदिश को तीनताल और राग मियां मल्हार में पेश किया गया।
कथक की लयकारी, नृत्यात्मक अभिव्यक्ति और तीनताल की द्रुत लय के विभिन्न पक्षों की प्रस्तुति ने सांस्कृतिक संध्या को यादगार बना दिया।




