सोचिए, आपने जीवन बीमा लेते समय अपनी शराब पीने की आदत तक इंश्योरेंस कंपनी को साफ-साफ बता दी। मेडिकल जांच भी कंपनी के पैनल डॉक्टर से कराई। पॉलिसी जारी हो गई और आप नियमित रूप से प्रीमियम भी भरते रहे। लेकिन करीब दो साल बाद आपकी मौत हो जाए और परिवार जब बीमा की रकम मांगने पहुंचे तो कंपनी कह दे—जानकारी छिपाई गई थी, इसलिए क्लेम नहीं मिलेगा।
कुछ ऐसा ही मामला नागपुर में सामने आया, जहां 50 लाख रुपये के लाइफ इंश्योरेंस क्लेम को लेकर इंश्योरेंस कंपनी और मृतक की पत्नी के बीच विवाद पहुंच गया उपभोक्ता आयोग तक। कंपनी ने दावा किया कि पॉलिसीधारक ने शराब पीने की आदत के साथ डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों की जानकारी छिपाई थी। लेकिन सुनवाई के दौरान कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि कंपनी के अपने दस्तावेज ही उसके दावे के खिलाफ सबसे बड़ा सबूत बन गए।
नागपुर जिला उपभोक्ता आयोग ने अब एडलवाइज टोकियो लाइफ इंश्योरेंस को 50 लाख रुपये का क्लेम 9 फीसदी सालाना ब्याज के साथ देने का आदेश दिया है। इसके अलावा मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के लिए 10 हजार रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 10 हजार रुपये अतिरिक्त देने को कहा गया है।
पति की मौत के बाद पत्नी ने मांगा 50 लाख का क्लेम
मामला एक महिला के पति की लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी से जुड़ा है। पति ने अप्रैल 2021 में इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदी थी। पॉलिसी की रकम 50 लाख रुपये थी। इसके करीब दो साल बाद 26 जनवरी 2023 को उनकी अचानक मौत हो गई। पति की मौत के बाद पत्नी ने बीमा कंपनी के सामने पॉलिसी के तहत 50 लाख रुपये के क्लेम के लिए आवेदन किया। परिवार को उम्मीद थी कि मुश्किल वक्त में इंश्योरेंस की रकम सहारा बनेगी। लेकिन कंपनी ने क्लेम देने के बजाय पॉलिसी ही रद्द कर दी।
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सितंबर 2023 में कंपनी ने महिला को करीब 18,713 रुपये का प्रीमियम रिफंड चेक भेज दिया। यानी जिस पॉलिसी के तहत परिवार 50 लाख रुपये की सुरक्षा की उम्मीद कर रहा था, कंपनी ने उसका भुगतान करने के बजाय पॉलिसी खत्म कर दी। इसके बाद महिला ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
कंपनी ने कहा- शराब और बीमारियों की जानकारी छिपाई
सुनवाई के दौरान इंश्योरेंस कंपनी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि मृतक ने अपनी पुरानी शराब पीने की आदत के अलावा हाइपरटेंशन और डायबिटीज जैसी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी कंपनी से छिपाई थी। कंपनी ने इसे पॉलिसी लेते समय सही और पूरी जानकारी नहीं देने का मामला बताया। बीमा कंपनी का तर्क था कि अगर उसे ये महत्वपूर्ण जानकारियां पहले पता होतीं तो पॉलिसी जारी करने का फैसला अलग हो सकता था। लेकिन यहीं पर कंपनी का दावा कमजोर पड़ गया। आयोग के सामने जब पॉलिसी से जुड़े दस्तावेज रखे गए तो पता चला कि शराब के सेवन की जानकारी वास्तव में कंपनी से छिपाई ही नहीं गई थी।
मेडिकल फॉर्म में खुद बताई थी शराब पीने की बात
आयोग ने पाया कि पॉलिसी जारी होने से पहले 20 मई 2021 को भरे गए मेडिकल एग्जामिनेशन फॉर्म में मृतक ने अपनी शराब पीने की आदत के बारे में जानकारी दी थी। फॉर्म में बताया गया था कि वह पिछले करीब 15 साल से महीने में दो बार लगभग 90 एमएल व्हिस्की का सेवन करता था। यानी जिस शराब की आदत को कंपनी क्लेम खारिज करने का आधार बता रही थी, उसकी जानकारी पॉलिसी जारी होने से पहले ही कंपनी के रिकॉर्ड में मौजूद थी। आयोग के सामने यह सवाल अहम हो गया कि जब पॉलिसी जारी करने से पहले कंपनी को शराब के सेवन की जानकारी दी जा चुकी थी, तो बाद में उसी जानकारी को छिपाने का आरोप लगाकर क्लेम कैसे खारिज किया जा सकता है?
कंपनी के पैनल डॉक्टर की रिपोर्ट भी बनी अहम
मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। इंश्योरेंस कंपनी की ओर से पॉलिसी जारी करने से पहले मेडिकल परीक्षण कराया गया था। यह जांच कंपनी के पैनल डॉक्टर ने की थी। आयोग ने पाया कि इस मेडिकल परीक्षण में डॉक्टर ने हाइपरटेंशन या डायबिटीज के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया था। ऐसे में इन बीमारियों को लेकर कंपनी का बाद का दावा भी सवालों के घेरे में आ गया। आयोग ने माना कि केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि पॉलिसीधारक को कोई बीमारी थी। अगर कंपनी ने खुद मेडिकल जांच कराई थी और उसकी रिपोर्ट में संबंधित बीमारी दर्ज नहीं की गई, तो बाद में उसी आधार पर क्लेम को खारिज करने के लिए ठोस आधार जरूरी होगा।
आयोग ने कहा- पहले से बताई जानकारी पर नहीं ठुकरा सकते क्लेम
मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यही रही कि शराब के सेवन की जानकारी पॉलिसी जारी होने से पहले ही कंपनी को दी जा चुकी थी। आयोग ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए कंपनी की दलील को स्वीकार नहीं किया। आयोग का कहना था कि जिस जानकारी का खुलासा पॉलिसी जारी होने से पहले ही रिकॉर्ड में मौजूद है, उसे बाद में क्लेम खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। यानी बीमा कंपनी अगर किसी तथ्य को जानने के बावजूद पॉलिसी जारी करती है, तो बाद में उसी ज्ञात तथ्य को छिपाने का आरोप लगाकर परिवार के क्लेम को खारिज करना सवालों के घेरे में आएगा।
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50 लाख रुपये, 9 फीसदी ब्याज और मुआवजा
नागपुर जिला उपभोक्ता आयोग ने अब एडलवाइज टोकियो लाइफ इंश्योरेंस को मृतक की पत्नी को 50 लाख रुपये का बीमा क्लेम देने का आदेश दिया है। इस रकम पर 9 फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा। ब्याज की गणना 30 सितंबर 2023 से की जाएगी। इसके साथ ही आयोग ने महिला को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के लिए 10 हजार रुपये तथा मुकदमे के खर्च के लिए 10 हजार रुपये अलग से देने का आदेश दिया है।
डायबिटीज और हाई BP पर भी आयोग की अहम टिप्पणी
आयोग ने यह भी माना कि हाइपरटेंशन और डायबिटीज को सिर्फ लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां बताकर इंश्योरेंस क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता खासकर तब जब कंपनी की अपनी मेडिकल जांच में इन बीमारियों का उल्लेख नहीं किया गया हो। इस फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि लाइफ इंश्योरेंस लेते समय स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़ी जानकारी को लेकर अक्सर विवाद सामने आते हैं।
इस मामले में हालांकि दस्तावेजों ने साफ कर दिया कि शराब के सेवन की जानकारी पहले ही दी गई थी। ऐसे में कंपनी के लिए उसी तथ्य को बाद में छिपाई गई जानकारी बताना भारी पड़ गया। इस पूरे मामले से एक अहम बात सामने आती है—इंश्योरेंस पॉलिसी लेते समय दी गई हर जानकारी का रिकॉर्ड संभालकर रखना बेहद जरूरी है। क्योंकि मुश्किल वक्त में वही दस्तावेज तय कर सकते हैं कि परिवार को बीमा का पैसा मिलेगा या क्लेम विवाद में फंस जाएगा।
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