पेपर लीक आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार और CJP के बीच जारी बातचीत में एक बार फिर गतिरोध की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। समाचार एजेंसी के अनुसार, सरकार की ओर से अगले दौर की बातचीत के लिए भेजे गए नए प्रस्ताव को CJP ने स्वीकार नहीं किया। हालांकि, समाचार लिखे जाने तक संगठन की ओर से इस दावे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी। इस घटनाक्रम ने आंदोलन और सरकार के बीच समाधान की संभावनाओं पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
20 जुलाई से शुरू हुई थी वार्ता
सरकार और CJP के बीच बातचीत की शुरुआत 20 जुलाई को हुई थी। इसी दिन आंदोलनकारियों ने ‘संसद चलो’ मार्च का ऐलान किया था। मार्च के दौरान CJP के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से उनके आवास पर मुलाकात की थी।
संगठन के अनुसार, बैठक में जेपी नड्डा ने उनकी मांगों पर शीर्ष नेतृत्व से चर्चा करने का भरोसा दिया था। लेकिन बाद में CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि उनके प्रतिनिधियों को करीब पांच घंटे तक इंतजार कराया गया, जिससे वार्ता की प्रक्रिया प्रभावित हुई। इसके बाद संगठन ने घोषणा की कि उसके प्रतिनिधि दोबारा जेपी नड्डा के आवास पर नहीं जाएंगे और यदि सरकार बातचीत करना चाहती है तो उसे जंतर-मंतर आना होगा।
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रुख में आई नरमी, लेकिन नहीं बनी सहमति
बुधवार को CJP प्रवक्ता आशुतोष रांका ने संकेत दिए कि संगठन नड्डा के आवास पर नहीं, बल्कि किसी अन्य स्थान पर बातचीत के लिए तैयार है। इसके बावजूद गुरुवार को समाचार एजेंसी ने सरकारी सूत्रों के हवाले से दावा किया कि सरकार द्वारा भेजे गए नए वार्ता प्रस्ताव को भी संगठन ने अस्वीकार कर दिया। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
सोनम वांगचुक की शर्तों में बदलाव
25 दिनों से जारी अनशन के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने आंदोलन समाप्त करने के लिए अपनी कुछ शर्तों में बदलाव के संकेत दिए हैं। ताजा जानकारी के अनुसार, उन्होंने अब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को अपनी प्रमुख शर्तों में शामिल नहीं किया है। अब उनकी प्रमुख मांग यह बताई जा रही है कि आंदोलन में शामिल छात्रों के खिलाफ किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई न की जाए।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर कायम CJP
वहीं, CJP अब भी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पेपर लीक मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाने की घोषणा के बाद भी संगठन ने अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया। संगठन का कहना है कि उसकी प्राथमिक मांग धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है, जबकि सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार आंदोलन के समाधान के लिए अन्य विकल्पों पर भी विचार चाहती है।
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