बलिया, एनआईए संवाददाता।
1942 की अगस्त क्रांति भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का ऐसा अध्याय है, जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले ने इस आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाई और कुछ दिनों के लिए अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंककर अपनी स्वतंत्र सरकार स्थापित कर ली।
इतिहासकारों के अनुसार, बलिया में क्रांति की शुरुआत विद्यार्थियों के प्रदर्शनों और महिलाओं की भागीदारी से हुई। पुलिस की गोलीबारी और गिरफ्तारियों से जनता भड़क उठी और देखते ही देखते पूरे जिले में रेलवे स्टेशन, डाकघर, थाने और तहसीलें जनता के कब्जे में आ गए। सरकारी अधिकारियों ने आत्मसमर्पण कर दिया और जगह-जगह राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया।
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19 अगस्त 1942 को बलिया में ‘राष्ट्रीय सरकार’ का गठन हुआ। इसका नेतृत्व करिश्माई नेता चित्तू पांडेय ने किया, जिन्हें सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू ने ‘बलिया का शेर’ कहा। हजारों लोगों ने इस सरकार को समर्थन और आर्थिक सहयोग दिया।
बलिया के आंदोलन ने कई शहादतें भी देखीं। 16 अगस्त को लोहा पट्टी में गोलीकांड में 9 लोग शहीद हुए। 18 अगस्त को बैरिया थाने पर 19 क्रांतिकारी वीरगति को प्राप्त हुए। 18 वर्षीय कौशल कुमार ने गोली लगने के बावजूद थाने पर तिरंगा फहरा दिया, और उनका बलिदान इतिहास में अमर हो गया।
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यद्यपि अंग्रेजी दमन के चलते यह सरकार कुछ ही दिनों में खत्म कर दी गई, लेकिन बलिया की अगस्त क्रांति ने यह संदेश दिया कि भारत की आज़ादी अब दूर नहीं।