लखनऊ नगर निगम की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष का पद महीनों से खाली था। गिरीश गुप्ता के रिटायर होने के बाद इस कुर्सी पर बैठने की होड़ मची थी। नाम तीन-अनुराग मिश्रा, राजेश सिंह गब्बर और अरुण राय लगातार आगे बताए जा रहे थे। मगर राजनीति के खेल में बाजी अक्सर आखिरी क्षणों में पलटती है और वही हुआ।
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पार्टी नेतृत्व ने महिला पार्षद चरणजीत गांधी को आगे कर सबको चौंका दिया। यह फैसला सिर्फ संगठनात्मक संतुलन की वजह से नहीं बल्कि कई संकेतों से जुड़ा है। पहला, पार्टी नगर निगम की कार्यकारिणी में महिला नेतृत्व को जगह देकर “समावेशित” का संदेश देना चाहती है। दूसरा परंपरागत दावेदारों के बीच खींचतान से बचने का सबसे आसान रास्ता यही था कि एक नया नाम अचानक मैदान में उतारा जाए।
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महापौर सुषमा खर्कवाल की सहमति और कार्यकारिणी सदस्य अनुराग मिश्रा द्वारा खुद प्रस्ताव रखे जाने से यह तय हो गया कि पार्टी ने विरोध की गुंजाइश पहले ही खत्म कर दी थी। सवाल यह है कि क्या यह कदम सिर्फ समझौता था या भविष्य की नगर निगम राजनीति में कोई बड़ा प्रयोग?
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अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि चरणजीत गांधी अपने पूर्ववर्ती गिरीश गुप्ता की तरह कार्यकारिणी को गति दे पाएंगी या यह कुर्सी केवल सत्ता संतुलन का प्रतीक बनकर रह जाएगी। नगर निगम में उनकी कार्यशैली ही तय करेगी कि पार्टी का यह ‘गैम्बल’ कितना सफल साबित होता है।