राम मंदिर को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे धर्मसेना के संस्थापक संतोष दुबे ने दावा किया है कि 1989 के रामशिला पूजन अभियान के दौरान देश-विदेश से अयोध्या पहुंची करीब 1250 सोने, चांदी, अष्टधातु और बहुमूल्य रत्नों से बनी पूजित रामशिलाएं अब गायब हैं। उन्होंने इन शिलाओं के संरक्षण और प्रबंधन को लेकर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
यह दावा ऐसे समय सामने आया है, जब राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे और ट्रस्ट की वित्तीय पारदर्शिता को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रही है। हालांकि, इन आरोपों पर ट्रस्ट की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।
1989 रामशिला अभियान क्या था?
राम मंदिर आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए 1989 में विश्व हिंदू परिषद ने देशव्यापी रामशिला पूजन अभियान चलाया था। अभियान के तहत लोगों से सवा रुपये का सहयोग और पूजित शिलाएं अयोध्या भेजने की अपील की गई थी।
संतोष दुबे का दावा है कि साधारण पत्थरों के अलावा बड़ी संख्या में सोने, चांदी और अन्य बहुमूल्य धातुओं से बनी रामशिलाएं भी अयोध्या पहुंची थीं, जिनका रिकॉर्ड तैयार करने का काम उन्होंने स्वयं किया था।
‘तीन तालों में रखी गई थीं, फिर कहां गईं?’
दुबे के मुताबिक, बहुमूल्य रामशिलाओं को कारसेवकपुरम में तीन तालों की सुरक्षा के बीच रखा गया था और वर्ष 2002 तक वे वहां मौजूद थीं। इसके बाद उनका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं मिला। उनका आरोप है कि इन शिलाओं की देखरेख की जिम्मेदारी चंपत राय के पास थी और अब इनके बारे में जवाब दिया जाना चाहिए।
मॉरीशस से आई थी सबसे कीमती रामशिला!
संतोष दुबे का दावा है कि सबसे महंगी रामशिला मॉरीशस से आई थी, जबकि मुंबई के एक व्यापारी ने हीरों से जड़ी शिला दान की थी। उनका कहना है कि कुल 1250 बहुमूल्य शिलाओं में चांदी और सोने की शिलाओं की संख्या सबसे अधिक थी।
राम मंदिर चढ़ावे पर भी उठाए सवाल
संतोष दुबे ने दावा किया कि करोड़ों श्रद्धालुओं के दर्शन के बावजूद घोषित चढ़ावे के आंकड़ों पर सवाल खड़े होते हैं। उनका कहना है कि अगर हर श्रद्धालु औसतन छोटी राशि भी दान करे, तो कुल चढ़ावा घोषित आंकड़ों से कहीं अधिक होना चाहिए। हालांकि, धार्मिक ट्रस्टों की आय में नकद दान, डिजिटल भुगतान, बैंक ट्रांसफर, आभूषण, वस्तु-दान और अन्य वित्तीय मदें अलग-अलग दर्ज होती हैं। इसलिए केवल श्रद्धालुओं की संख्या के आधार पर कुल चढ़ावे का सटीक अनुमान लगाना संभव नहीं माना जाता।

चंपत राय पर सीधे आरोप
संतोष दुबे ने कहा कि रामशिलाओं से लेकर दान प्रबंधन तक कई मामलों में पारदर्शिता की जरूरत है। उनका आरोप है कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान मिले बहुमूल्य दान का पूरा हिसाब सार्वजनिक नहीं किया गया। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच या आधिकारिक पुष्टि अभी तक सामने नहीं आई है और ट्रस्ट की प्रतिक्रिया का इंतजार है।
अब उठ रहे हैं ये बड़े सवाल
1989 में आईं बहुमूल्य रामशिलाएं आखिर कहां हैं?
क्या इनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद है?
क्या श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट इन आरोपों पर सफाई देगा?
क्या इस पूरे मामले की जांच की मांग उठ सकती है?
जाने कौन हैं संतोष दुबे
रामलला के लिए जिया, गोलियां खाईं और 22 दिन कोमा में रहा’: बाबरी विध्वंस के आरोपी संतोष दुबे की जुबानी 6 दिसंबर 1992 की कहानी
6 दिसंबर 1992 भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित और विवादित तारीखों में से एक है। इसी दिन अयोध्या में स्थित बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा दिया गया था। इस घटना से जुड़े आरोपियों में शामिल रहे संतोष दुबे आज भी खुद को राम मंदिर आंदोलन का एक समर्पित कारसेवक बताते हैं। उनका दावा है कि वे रामलला के लिए जिए, संघर्ष किया, गोलियां खाईं और मौत के मुंह से लौटकर आए।
एक बातचीत में संतोष दुबे ने 1990 की कारसेवा से लेकर 6 दिसंबर 1992 की घटनाओं तक अपने अनुभव साझा किए। यह उनके व्यक्तिगत दावों और संस्मरणों पर आधारित कहानी है।
1990 की कारसेवा ने बदल दी सोच
संतोष दुबे के मुताबिक, 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवक बाबरी ढांचे पर चढ़ गए थे, लेकिन उनके पास उसे नुकसान पहुंचाने के लिए जरूरी साधन नहीं थे। उनका कहना है कि उस समय कारसेवकों के पास केवल भगवा ध्वज फहराने का अवसर था, जबकि उनका उद्देश्य इससे आगे का था।
दुबे का दावा है कि 2 नवंबर 1990 को हुई पुलिस कार्रवाई में उन्हें चार गोलियां लगीं और उनके कई साथी मारे गए। वे इस घटना को अपने जीवन का सबसे दर्दनाक दौर बताते हैं।
‘डेढ़ साल तक बनाई गई योजना’
संतोष दुबे के अनुसार, 1990 की घटनाओं के बाद कुछ कारसेवकों ने संगठित तैयारी शुरू की। उनका दावा है कि करीब पांच हजार स्वयंसेवकों का एक समूह तैयार किया गया और इसके लिए गांव-गांव जाकर लोगों से संपर्क किया गया। वे बताते हैं कि इस दौरान ढांचे को गिराने के लिए आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था भी की गई और सारी योजना बेहद गोपनीय रखी गई।
6 दिसंबर 1992: जब शुरू हुई कारसेवा
दुबे के अनुसार, 6 दिसंबर 1992 को एक तरफ मंच से नेताओं के भाषण चल रहे थे, जबकि दूसरी तरफ पहले से तय योजना के तहत अलग-अलग टीमें सक्रिय हो गईं। उनका दावा है कि कुल 17 टीमें बनाई गई थीं और कारसेवकों ने एक-एक कर बाबरी ढांचे के तीनों गुंबदों को गिरा दिया। संतोष दुबे कहते हैं कि तीसरे गुंबद के गिरने के दौरान वे उसके नीचे दब गए और गंभीर रूप से घायल हो गए।
’17 हड्डियां टूटीं, 22 दिन कोमा में रहा’
दुबे का कहना है कि मलबे में दबने से उनके शरीर की 17 हड्डियां टूट गईं। उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृतप्राय घोषित कर दिया था। उनका दावा है कि बाद में उन्हें बेहतर इलाज के लिए लखनऊ ले जाया गया और वे लगभग 22 दिनों तक कोमा में रहे। इसके बाद धीरे-धीरे उनकी स्थिति में सुधार हुआ।
1990 के गोलीकांड की दर्दनाक यादें
संतोष दुबे बताते हैं कि 2 नवंबर 1990 की गोलीबारी का दृश्य आज भी उन्हें याद है। उनका दावा है कि उनके सामने कई कारसेवकों को गोली लगी और कई लोगों की मौत हुई। वे कहते हैं कि उस दिन अयोध्या की गलियां खून से भर गई थीं और चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था।
परमहंस रामचंद्र दास से जुड़ी यादें
संतोष दुबे खुद को दिगंबर अखाड़े के महंत परमहंस रामचंद्र दास का शिष्य बताते हैं। उनके अनुसार, परमहंस जी राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरों में थे और उन्होंने हमेशा आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया। दुबे का कहना है कि परमहंस रामचंद्र दास को विश्वास था कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण होगा।
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‘राम मंदिर बनने तक अपना घर नहीं बनाऊंगा’
संतोष दुबे के अनुसार, उन्होंने संकल्प लिया था कि जब तक रामलला का भव्य मंदिर नहीं बन जाएगा, तब तक वे अपना नया घर नहीं बनाएंगे। उनका कहना है कि यह संकल्प उन्होंने आंदोलन के दौरान लिया था।
‘मैं बाबरी विध्वंस मामले का आरोपी हूं’
संतोष दुबे स्वीकार करते हैं कि बाबरी विध्वंस मामले में उनका नाम आरोपियों में शामिल रहा और उस दौरान उनके परिवार को भी कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ा। उनका कहना है कि आंदोलन के दौरान जो लक्ष्य तय किया गया था, उसे वे अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा उद्देश्य मानते हैं।
आज का संतोष दुबे
करीब तीन दशक बाद भी संतोष दुबे खुद को राम मंदिर आंदोलन का कार्यकर्ता बताते हैं। उनका कहना है कि राम मंदिर का निर्माण उनके जीवन के सबसे बड़े सपनों में से एक था और मंदिर निर्माण को वे अपने संघर्षों की परिणति मानते हैं।
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