उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सामने आया तीन तलाक का एक मामला न केवल एक परिवार की निजी त्रासदी है, बल्कि वर्षों से चल रही तीन तलाक़ कानून बनाम विचारधारा की राष्ट्रीय बहस का जीवंत उदाहरण भी बन गया है।
मशहूर शायर मुनव्वर राणा की बेटी हिबा राणा ने अपने पति मो. साकिब पर दहेज उत्पीड़न, जानलेवा हमला करने और तीन तलाक़ देकर घर से निकालने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़िता की तहरीर पर पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और जांच जारी है।
कल तक विरोध, आज कानून ही सहारा
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हिबा राणा वही महिला हैं, जिन्होंने अपनी बहन उरूशा राणा के साथ मिलकर कभी तीन तलाक़ कानून का खुलकर विरोध किया था। उस समय इसे धार्मिक परंपरा, निजी आस्था और समुदाय के अधिकारों से जोड़कर देखा गया था और कानून को अनावश्यक हस्तक्षेप बताया गया था।
लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। वही परंपरा, जिसे कभी बचाने की बात की गई थी, अब जीवन की असुरक्षा और पीड़ा का कारण बन गई है। जिस कानून को पहले नकारा गया, आज वही न्याय और सुरक्षा का एकमात्र सहारा बनकर सामने आया है।
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“दुरुपयोग” के तर्क पर सवाल
यह प्रकरण उन दावों पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है, जिनमें कहा जाता रहा है कि तीन तलाक़ कानून का दुरुपयोग होगा। जमीनी हकीकत यह है कि जब किसी महिला को बिना प्रक्रिया, बिना संवाद और बिना सुरक्षा के घर से निकाल दिया जाता है, तब कानून का हस्तक्षेप दुरुपयोग नहीं बल्कि आवश्यक संरक्षण बन जाता है।
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परंपरा बनाम संविधान
मामला यह भी स्पष्ट करता है कि धार्मिक परंपराओं की एक सीमा होती है। आस्था निजी हो सकती है, लेकिन जब प्रश्न महिला के जीवन, सम्मान और अधिकारों का हो, तब संविधान और कानून सर्वोपरि हो जाते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।
कानून सबके लिए समान
उत्तर प्रदेश सरकार का रुख स्पष्ट है कि कानून सभी के लिए समान है। पहचान, सामाजिक हैसियत या वैचारिक पृष्ठभूमि न्याय के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती। यह मामला इस बात का प्रतीक बन गया है कि कानून यह नहीं देखता कि आपने कभी उसका समर्थन किया या विरोध—वह केवल यह देखता है कि अन्याय हुआ है या नहीं।
यह प्रकरण एक कड़ा संदेश देता है कि विचारधाराएं मंचों तक सीमित हो सकती हैं, लेकिन जब जीवन पर संकट आता है, तब कानून ही अंतिम और सबसे बड़ा सहारा होता है।
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