जब गाजा के लिए आवाज उठी, तो बांग्लादेश में हिंदुओं की चीख क्यों अनसुनी रह गई?

फिलिस्तीन पर मुखरता, बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर चुप्पी

क्यों बन गया मानवाधिकार कंडीशनल

डॉ. संजय पांडेय

नई दिल्ली।

अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर सार्वजनिक हस्तियों की प्रतिक्रियाएं अक्सर मानवीय संवेदना के नाम पर आती हैं, लेकिन हालिया घटनाक्रम एक असहज सवाल खड़ा करता है।क्या मानवाधिकार की चिंता भी अब चयनात्मक हो गई है।इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप का आकलन है कि जब गाजा में इस्रायली सैन्य कार्रवाई के दौरान नागरिक हताहतों की खबरें आईं, तब भारतीय सेलिब्रिटी, विपक्षी नेता, पश्चिमी शहरों के मेयर और वैश्विक मंच सक्रिय दिखे। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक युद्धविराम की कोशिशों में उतरे। लेकिन अब, जब बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर लक्षित हमलों, निर्दोषों की हत्याएं,मंदिरों में तोड़फोड़, घरों में आगजनी और नफरत फैलाने की घटनाओं की रिपोर्टें सामने हैं, वही मुखरता दुर्लभ क्यों है।

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप (आईसीजी) अपनी रिपोर्टों में बार-बार यह रेखांकित करता रहा है कि नागरिकों की सुरक्षा किसी भी संघर्ष या आंतरिक हिंसा का केंद्रीय प्रश्न होना चाहिए। जब मानवाधिकारों की भाषा भू-राजनीति, पहचान-राजनीति या वैश्विक ट्रेंड से संचालित होने लगती है, तब वह अधिकार नहीं, बल्कि चयनात्मक नैतिकता का रूप ले लेती है। दक्षिण एशिया पर केंद्रित आईसीजी के विश्लेषण बताते हैं कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पर यदि सामाजिक और सार्वजनिक चुप्पी रहती है तो वह हिंसा धीरे-धीरे सामान्यीकृत होने लगती है। यही वह बिंदु है जहां मौजूदा वैश्विक विमर्श पर सवाल खड़े होते हैं।

फिलिस्तीन मुद्दा: वैश्विक नैरेटिव और भारतीय सार्वजनिक प्रतिक्रिया

गाजा संघर्ष के दौरान अंतरराष्ट्रीय मीडिया, विश्वविद्यालय परिसरों, सामाजिक संगठनों और डिजिटल अभियानों में फिलिस्तीन का मुद्दा केंद्र में रहा। पश्चिमी मीडिया में नागरिक हताहतों की तस्वीरें, बच्चों और अस्पतालों पर हमलों की रिपोर्टें लगातार प्रसारित होती रहीं। इसी वैश्विक नैरेटिव का प्रभाव भारतीय सार्वजनिक विमर्श पर भी पड़ा। राजनीतिक स्तर पर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने नागरिक हत्याओं की निंदा की।अंतरराष्ट्रीय मंच पर न्यूयॉर्क के नए मेयर जोहरान ममदानी सहित कई निर्वाचित प्रतिनिधियों ने युद्धविराम की मांग को समर्थन दिया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कूटनीतिक मध्यस्थता की कोशिशें कीं और अस्थायी समझौतों की पहल हुई। यह सक्रियता इस बात का प्रमाण थी कि फिलिस्तीन का मुद्दा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक मानवीय संकट के रूप में प्रस्तुत किया गया।

बॉलीवुड और सेलिब्रिटी वर्ग की सक्रियता: सोशल मीडिया रिकॉर्ड

इसी अवधि में भारतीय फिल्म उद्योग और सेलिब्रिटी जगत का एक बड़ा वर्ग सोशल मीडिया पर अत्यंत सक्रिय दिखाई दिया। इंस्टाग्राम स्टोरी, एक्स पोस्ट और सार्वजनिक संदेशों के जरिए सीजफायर, स्टॉप किलिंग सिविलियंस और ह्यूमैनिटी फर्स्ट जैसे संदेश साझा किए गए।
ओपन-डोमेन रिकॉर्ड के अनुसार अभिनेत्री करीना कपूर खान ने गाजा में नागरिक हताहतों पर चिंता जताते हुए युद्ध रोकने से जुड़े संदेश साझा किए। करिश्मा कपूर ने फिलिस्तीन समर्थक अंतरराष्ट्रीय पोस्ट्स को री-शेयर किया। आलिया भट्ट ने युद्ध से प्रभावित बच्चों से जुड़े वैश्विक अभियानों को अपनी स्टोरी में साझा किया।इसी क्रम में सोनाक्षी सिन्हा, स्वरा भास्कर, दिया मिर्जा, नंदिता दास, रिचा चड्ढा, अनुभव सिन्हा, जोया अख्तर और फरहान अख्तर ने भी नागरिक सुरक्षा और युद्धविराम से जुड़े संदेश पोस्ट या री-पोस्ट किए। मल्लिका दुआ और कुब्रा सैत ने अंतरराष्ट्रीय एक्टिविस्ट नेटवर्क से जुड़े अभियानों को साझा किया। मुख्यधारा के और लोकप्रिय नामों में दीपिका पादुकोण, कटरीना कैफ, सोनम कपूर, हुमा कुरैशी, रजा मुराद, इम्तियाज अली और विशाल ददलानी भी शामिल रहे, जिन्होंने मानवीय अपीलों या संयुक्त राष्ट्र से जुड़े संदर्भों को साझा किया। इनमें से अधिकांश पोस्ट्स में यह स्पष्ट किया गया कि उनका पक्ष राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय है। यही दावा इस पूरी बहस का केंद्रीय आधार भी बनता है।

बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक और हिंसा का पैटर्न

मानवाधिकार संगठनों, क्षेत्रीय मीडिया और आधिकारिक बयानों के अनुसार बांग्लादेश के विभिन्न हिस्सों में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हालिया महीनों में लक्षित हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं। पिछले एक सप्ताह के दौरान ही 7-8 हिंदू युवकों की खुलेआम उग्र भीड़ ने नृशंस हत्या कर दी। हिंदू विधवा महिलाओं से सामूहिक बलात्कार किए गए। मंदिरों में व्यापक तोड़फोड़, घरों और दुकानों पर हमले, धमकियां और कुछ मामलों में पलायन की खबरें भी दर्ज की गई हैं।ऐसी घटनाओं को यदि केवल स्थानीय कानून-व्यवस्था की समस्या मान लिया जाए तो यह अल्पसंख्यक- विरोधी हिंसा की संरचनात्मक प्रकृति को नजरअंदाज करने जैसा होता है। आईसीजी का स्पष्ट कहना है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ आवर्ती हिंसा लोकतांत्रिक ढांचे के लिए दीर्घकालिक खतरा बनती है।

वही मंच, वही चेहरे लेकिन अलग चुप्पी

यहीं से दोहरे मापदंड का प्रश्न जन्म लेता है। जिन सोशल मीडिया खातों से फिलिस्तीन के लिए भावनात्मक और नैतिक अपीलें की गईं, उन्हीं खातों से बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रही हिंसा के संदर्भ में वैसी ही स्पष्ट और संगठित प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती। न तो नागरिक सुरक्षा जैसे शब्द व्यापक रूप से उपयोग में आए, न ही अंतरराष्ट्रीय अभियानों की तरह समन्वित पोस्ट्स दिखीं। यह अंतर महज संयोग नहीं लगता, बल्कि एक पैटर्न का संकेत देता है।

पहचान-राजनीति, वैश्विक ट्रेंड और डर

सार्वजनिक हस्तियों की प्रतिक्रियाएं अब कई बार इस बात से तय होने लगी हैं कि कौन-सा मुद्दा वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य है। फिलिस्तीन का मुद्दा दशकों से पश्चिमी अकादमिक और सांस्कृतिक स्पेस में प्रमुख रहा है। इसके विपरीत दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों पर हिंसा अक्सर क्षेत्रीय मामला कहकर सीमित कर दी जाती है। कुछ विश्लेषक यह भी इंगित करते हैं कि मुस्लिम- बहुल देशों में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की आलोचना करने से कई सार्वजनिक हस्तियां इसलिए बचती हैं क्योंकि उन्हें इस्लामोफोबिया के आरोप का डर रहता है। नतीजतन, मानवाधिकार की सार्वभौमिक अवधारणा राजनीतिक सुविधा के अधीन हो जाती है।

भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया और सामाजिक अपेक्षा

भारत सरकार ने बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर कूटनीतिक स्तर पर चिंता जताई है। लेकिन लोकतंत्र में केवल सरकारी बयान पर्याप्त नहीं होते। जिन सार्वजनिक हस्तियों के पास करोड़ों लोगों तक पहुंचने की क्षमता है, उनसे अपेक्षा होती है कि वे समान मानवीय मानकों पर प्रतिक्रिया दें। सार्वजनिक चुप्पी भी एक प्रकार का संदेश होती है, जो पीड़ित समुदायों के मनोबल को प्रभावित करती है और हमलावरों के हौसले बुलंद करती है।

सोशल मीडिया पैटर्न: संयोग नहीं, संरचना

सोशल मीडिया ट्रैकिंग के तुलनात्मक विश्लेषण से एक स्पष्ट अंतर उभरता है। फिलिस्तीन के मामले में पोस्ट्स अक्सर एक-दूसरे के समान समय पर, समान शब्दावली और अंतरराष्ट्रीय हैशटैग्स के साथ साझा किए गए। इसके विपरीत, बांग्लादेश में हिंदुओं पर हिंसा के मामलों में वैसा कोई समयबद्ध या संगठित पैटर्न दिखाई नहीं देता। यह सेलेक्टिव एम्पैथी की श्रेणी में आता है,जहां आवाज की तीव्रता पीड़ा की गंभीरता से नहीं बल्कि उसकी वैश्विक स्वीकार्यता से तय होती है।

कड़वी लेकिन आवश्यक सच्चाई

यह रिपोर्ट किसी एक अभिनेता, अभिनेत्री या विचारधारा के विरुद्ध नहीं है। यह सवाल सार्वजनिक नैतिकता का है। फिलिस्तीन के लिए आवाज उठाना मानवता है, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रही हिंसा पर चुप्पी उसी मानवता की सबसे कठिन परीक्षा है। यदि मानवाधिकार चयनात्मक हो जाएं तो वे अधिकार नहीं, बल्कि राजनीतिक औजार बन जाते हैं। आज का वैश्विक विमर्श इसी चौराहे पर खड़ा है,जहां यह तय होना बाकी है कि न्याय सार्वभौमिक रहेगा या पहचान- आधारित। इतिहास अंततः यह दर्ज करेगा कि किन पीड़ाओं को सुना गया और किन्हें बेपनाह दर्द में डूबी हुई खामोशी के हवाले कर दिया गया।

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