लखनऊ से सीखें यूपी के सभी नगर निगम के आयुक्त, अब एक लाख से अधिक के होंगे ई-टेंडर

लखनऊ, एनआईए संंवाददाता।

नगर निगम प्रशासन ने विकास कार्यों में पारदर्शिता लाने और बजट की बचत सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। अब नगर निगम के एक लाख से अधिक के सभी सामान्य मद के कार्य ई-टेंडरिंग प्रक्रिया के तहत कराए जाएंगे। इस पहल का उद्देश्य भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना, गुणवत्ता सुधारना और उन क्षेत्रों में भी विकास कार्यों को पहुंचाना है जो अभी तक उपेक्षित रहे हैं।

15% तक सस्ते पड़ सकते हैं टेंडर, 40% तक संभावित बचत

नगर आयुक्त गौरव कुमार के अनुसार, ई-टेंडरिंग से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी जिससे ठेके सस्ते दर पर मिलेंगे। इससे औसतन 15 प्रतिशत तक की सीधी बचत होगी। अधिकारियों के मुताबिक जब निर्माण फाइलें वास्तविक लागत पर बनेंगी और फर्जी खर्च रोका जाएगा तो कुल मिलाकर 40% तक की बचत संभव है। इस बचत को नगर निगम उपेक्षित इलाकों के विकास में खर्च करेगा।

अब तक मैनुअल टेंडर में होती थी मनमानी

वर्तमान में अधिकांश विकास कार्य मैनुअल टेंडर से होते हैं। हालांकि अखबारों में टेंडर प्रकाशित होते हैं, लेकिन ठेके पहले से तय होते हैं। निर्माण कार्यों में अक्सर फाइलों में लागत अधिक और वास्तविकता में कम दिखाई जाती है। नगर आयुक्त ने हाल ही में ऐसे कई निर्माणों पर सवाल उठाए थे।

महापौर और वार्ड निधि अभी ई-टेंडर से बाहर

फिलहाल महापौर और पार्षदों की वार्ड विकास निधियों से होने वाले रू10 लाख तक के कार्य अभी भी मैनुअल टेंडर से ही होते हैं। सूत्रों का कहना है कि काम को जानबूझकर टुकड़ों में बांटकर मनचाहे ठेकेदार को दिया जाता है। हालांकि नगर निगम प्रशासन भविष्य में इन निधियों को भी ई-टेंडर प्रक्रिया में लाने पर विचार कर रहा है।

नगर आयुक्त गौरव कुमार का बयान

हमने एक लाख रुपये से अधिक के सामान्य मद के कार्यों को ई-टेंडर के दायरे में लाया है। इससे न सिर्फ पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि बचत का इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों के विकास में किया जा सकेगा जो अब तक उपेक्षित रहे हैं।

एनआईए टिप्पणी

नगर निगम की यह पहल अगर ईमानदारी से लागू की जाती है तो इससे दोहरे लाभ की संभावना है, भ्रष्टाचार पर अंकुश और बजट का बेहतर उपयोग। यह निर्णय आने वाले समय में नगर प्रशासन की कार्यशैली में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत कर सकता है।

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