डाक बैग सिर्फ थैलियां नहीं होते, उनमें जनता का भरोसा बंद होता है। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में यह भरोसा अब खुले आसमान के नीचे धूल, बारिश और लापरवाही के हवाले कर दिया गया है।
लखनऊ स्थित जनरल पोस्ट ऑफिस (GPO) में 2000 से अधिक मेल बैग खुले में पड़े हैं। इन बैगों में लाखों नागरिकों के जरूरी दस्तावेज़, सरकारी पत्र, बैंक कागज़ात और न्यायिक नोटिस होने की पूरी संभावना है। इसके बावजूद डाक विभाग के शीर्ष अधिकारी पूरी तरह मौन हैं।
खुले में पड़ी चिट्ठियां, खतरे में नागरिकों की सुरक्षा
जिन मेल बैगों को सुरक्षित स्ट्रॉन्ग रूम या नियंत्रित स्टोरेज में होना चाहिए, वे खुले परिसर में पड़े हैं। इनमें शामिल हो सकते हैं—
आधार व अन्य पहचान पत्र
बैंक और बीमा से जुड़े दस्तावेज़
कोर्ट के नोटिस और समन
पेंशन, छात्रवृत्ति और सरकारी आदेश
निजी व गोपनीय पत्राचार
सवाल सीधा है—अगर इन दस्तावेज़ों का दुरुपयोग हुआ तो जिम्मेदार कौन होगा?
राजधानी में यह हाल, तो जिलों का क्या?
यह कोई दूरदराज़ का उपडाकघर नहीं, बल्कि राज्य का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण GPO है।
अगर राजधानी में डाक व्यवस्था इस कदर बदहाल है, तो जिलों और ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति की कल्पना ही भयावह है।
GPO परिसर में—
मेल स्टोरेज की कोई ठोस व्यवस्था नहीं
सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम नदारद
निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल
यह तस्वीर एक दफ्तर की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के फेल होने की गवाही देती है।
शीर्ष अधिकारी मौन क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इस स्थिति की जानकारी नहीं?
या जानकारी होते हुए भी आंखें मूंद ली गई हैं?
क्या निरीक्षण और जवाबदेही सिर्फ फाइलों तक सिमट कर रह गई है?
अब तक न कोई निलंबन, न कोई शो-कॉज नोटिस, न कोई आधिकारिक बयान सामने आया है।
यह मौन अब संयोग नहीं, प्रशासनिक उदासीनता का सबूत बनता जा रहा है।
डिजिटल इंडिया बनाम डाक की बदहाली
एक ओर सरकार “डिजिटल इंडिया” का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर—
अदालतें
बैंक
सरकारी विभाग
आम नागरिक
आज भी डाक विभाग पर निर्भर हैं। ऐसे में डाक सामग्री का खुले में पड़ा होना न्याय व्यवस्था, वित्तीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों पर सीधा हमला है।
अगर नुकसान हुआ तो?
कल्पना कीजिए—
कोर्ट नोटिस न मिलने पर किसी की गिरफ्तारी हो जाए
बुजुर्ग की पेंशन अटक जाए
छात्र की छात्रवृत्ति रुक जाए
बैंक दस्तावेज़ का दुरुपयोग हो जाए
तो क्या इसकी जिम्मेदारी कोई लेगा?
या फिर हर बार की तरह “जांच के आदेश” देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
यह लापरवाही नहीं, सिस्टम फेल्योर है
लखनऊ GPO की हालत साफ बताती है—
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मानव संसाधन प्रबंधन विफल
लॉजिस्टिक्स और स्टोरेज की कोई योजना नहीं
नेतृत्व स्तर पर गंभीरता का अभाव
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस अव्यवस्था को सामान्य मान लिया गया है।
सरकार से सीधे सवाल
अब यह मुद्दा सिर्फ डाक विभाग तक सीमित नहीं रहा।
सवाल सीधे—
संचार मंत्रालय
भारत सरकार
डाक विभाग के राष्ट्रीय नेतृत्व
से है।
क्या राजधानी में खुले में पड़े हज़ारों मेल बैग भी “छोटी तकनीकी समस्या” हैं?
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जनता का भरोसा टूट रहा है
डाक विभाग केवल सेवा नहीं, बल्कि भरोसे की संस्था रहा है।
लेकिन लखनऊ GPO की यह तस्वीरें उस भरोसे को गहरी चोट पहुंचा रही हैं।
अगर जल्द—
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई
व्यवस्था में ठोस सुधार नहीं हुआ
तो जनाक्रोश और बड़े आंदोलन से इनकार नहीं किया जा सकता।
लखनऊ GPO में खुले में पड़े 2000 से अधिक मेल बैग आज चेतावनी हैं—
आज लखनऊ, कल पूरा देश।
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