Friday , September 30 2022

भाजपा को अपनी रणनिती बदलनी होगी

डॉ धीरज फुलमती सिंह
वरिष्ठ स्तंभकार

एक आम भारतीय महानगरी चार सदस्यो वाले परिवार की मूल जरूरतें क्या होती है ? मकान, खाना, कपडा, बिजली,पानी और शिक्षा! अब मान लिजिए कि एक ऑटो चालक या रेहडी वाले की मासिक कमाई 20000/- रूपये है। दिन प्रतिदिन बढती इतनी महंगाई में बीस हजार रूपये प्रति माह कमाने वाले व्यक्ति का खुद का घर हो भी कैसे सकता है ? महानगर में खुद का घर ना होने की स्थिती में कम से कम उसे 4000/- रूपये किराया चुकाना पडता होगा,दो बच्चो कि स्कूल फिस व अन्य खर्च 4000/- रूपये, सामान्य खाने पीने पर अंदाजा 6000/- रूपये, बिजली-पानी,गैस का बिल 1000/- मासिक,आने जाने और अन्य जरूरत पर अंदाज 4000/- रूपये मासिक, दवा दारू पर 1000/- रूपये यानी महीना खत्म होते ना होते उस के पास जहर खाने के भी पैसे नही बचते होगे ?
मैने यह पैमाना आम अवाम की सुखद परिस्थिती में बिना किसी कष्ट या समस्या के निकाला है,परिस्थिती विकट होने पर खर्च का दायरा काफी बढ सकता है। आप को एक मजेदार बात बताता हूँ, जुलाई 2018 में एमनेस्टी की सर्वे में यह खुलासा हुआ था कि भारत के महानगरो में एक औसत भिखारी महीने के 25000/- रूपये तक कमा लेता है और मेहनतकश औसतन 20000/- कमाता है। मेरा भी आकलन उसी सर्वे रिपोर्ट पर आधारित है,वर्ना कोरोना काल में तो आम भारतीय की हालत तो और भी पतली हुई है। यह बात मुझे बताने या जताने की कत्तई जरूरत नही है,आप को खुद ही अंदाजा होगा!
अब ऐसे में ऐसा कोई चमत्कार हो जाए कि इन महानगरीय आम परिवार की बिजली पानी फ्री हो जाए,खाने-पीने की मूल आवश्यकता हल हो जाए और बच्चो की फीस माफ होकर उनको और भी बेहतर शिक्षा मिलने लगे,तो क्या हो? ऐसा ही कुछ चमत्कार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जी ने भी किया है। उन्होने एक आप दिल्ली वासी की मूल जरूरतो को पूरा कर उनकी मूल समस्या काफी हद तक कम कर दी है।
एक आम निम्न मध्यम वर्गीय दिल्ली वासी को पिछले कई वर्षो से बिजली,पानी और गैस की समस्या कम कर दी है। स्कूल का स्तर बेहतर करके शिक्षा मुफ्त करवा दी है।दिल्ली में महिलाओ को मुफ्त यात्रा की सुविधा है। हर ऑटो चालक को कोरोना काल में 5000/- रूपये की मदद की है।करोना काल में मुफ्त अनाज की सुविधा मुहैया करवाई है। गौरतलब है कि मुफ्त अनाज मोदी सरकार ने मुहैया करवाई है लेकिन यह बात आम दिल्ली वासियों को समझाना मुश्किल है। यानी कि एक औसत दिल्लीवासी की आमदनी में लगभग 9000/- रूपये की मदद प्रत्येक माह हुई है।


एक बात और बताना चाहूँगा कि व्यक्तिगत तौर पर मै अरविंद केजरीवाल जी की राजनिती को नापसंद करता हूँ। उनका विरोधी हूँ,इस बात से भले मुझे फर्क पडे मगर अरविंद केजरीवाल जी को कोई फर्क नही पडता क्यो कि मैं उनका वोटर नही हूँ,ना दिल्ली में उनके विरोधियो का ही वोटर हूँ। मै दिल्ली का नागरिक नही हूँ। दिल्ली के मुख्यमंत्री को अगर किसी बात से फर्क पडता है तो वे है,उनके आम वोटर,जो चुनाव के वक्त उनको दिल खोल कर वोट करते है।
साईकिल रिक्सा,ऑटो चालक,रेहडी, खोमचे, आम महिला ही उनकी वोटर है। जिन्हे उन्होने बडी बखूबी साध रखा है। चुनाव के वक्त वोट डालने कौन जाता है ? युवा वर्ग,आम गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय लोग ही वोट डालने जाते है। यही समूह समर्थन में मुफ्त का प्रचार भी करता है। इस वर्ग का अधिकांश वोटर वर्तमान दिल्ली के मुख्यमंत्री से खुश है। उन से कोई सवाल,कोई विरोध नही है। स्वास्थ्य सुविधाओ की बात करू तो उन्होने डेगी, डेगू और मलेरिया पर काफी हद तक नियंत्रण कर लिया है,एक वक्त ये बीमारियां दिल्ली को खौफजदा कर देती थी। अरविंद केजरीवाल जी में एक खूबी और है कि वे आम जन की मानसिकता के अनुसार अपने सकारात्मक काम का प्रचार प्रसार भी खूब करते है,जोरो से करते है। मुझे नही लगता है कि कम से कम अगले दिल्ली चुनाव में भी मुख्यमंत्री की आम आदमी पार्टी को जीतने से कोई रोक सकता है। छुपे तौर पर दिल्ली की इलेक्ट्रॉनिक भी अरविंद केजरीवाल के समर्थन में है,इस लिए साक्षात्कार के वक्त उनसे कभी भी कठोर और तीखे सवाल करने से बचती है। एक बात और दिल्ली और पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए कमोवेश एक सी स्थिती है,दोनो प्रदेशो मे भाजपा के पास कोई करिश्माई नेता का चेहरा नही है। आज भी भाजपा मोदी के सहारे ही खडे रहने के प्रयास में है। एक लाठी कितनों को सहारा देगी,भले वह कितनी भी मजबूत क्यो ना हो!
भारत की केंद्रिय भाजपा की सरकार को इस बात को समझते हुए, अपनी चुनावी रणनीति को काफी हद तक आक्रमक और आम जन के अनुकूल माहौल तैयार करके योजना बनानी होगी। मोदी सरकार को समझना चाहिए कि काठ की हांडी बार-बार नही चढती। राष्ट्रवाद,हिदुत्व,भेदभाव और विकास के मुद्दे को आम जन तक पहुंचाने के लिए और धारदार बनाना होगा। एक चुटकुला हो या प्रेरणादायक व्याख्यान बार-बार कहने पर पहले जैसा मजा नही देते,बोर करते है। मोदी सरकार पिछले सात साल से लगातार लगभग एक सा ही मुद्दा उठाए हुए है। आम जन बोर हो जाए,इसके पहले भाजपा को चेत जाना चाहिए। हद से ज्यादा नफरत हो या प्यार एक वक्त के बाद निराशा और बोरियत ही पैदा करती है।
ऐश्वर्या राय बच्चन भले एक वक्त विश्व सुंदरी रही हो,मल्लिका-ए-हुस्न रही है,इसमे दो राय नही है कि वे बला की खुबसूरत है। उनकी एक झलक के लिए अधिकांशतः लोग पागल हो सकते है,उतावले हो सकते है,उनके हुश्न से हमे फर्क पड सकता है, लेकिन उनकी खुबसूरती से अभिषेक बच्चन को अब ज्यादा कुछ फर्क नही पडता है। उनके लिए तो यह जैसे रोज की बात है। केद्र सरकार को भी यह समझना चाहिए। एक ही नारा,एक विचार, एक जैसी बातें लगातार होने पर धीरे धीरे महत्व खत्म कर देती है। शादी के कुछ सालों बाद जिम्मेदारियों के बोझ तले प्यार का नशा भी काफूर हो जाता है,भले पत्नी अप्सरा ही क्यो ना हो! तब मायने रह जाता है,आपसी समझ-बूझ, व्यवहार,मनुहार और घर चलाने के लिए अर्थ! बाकी सब कुछ पीछे छूट जाता है।
मोदी सरकार को समझना होगा कि दिल्ली के साथ भारत की सत्ता में वापसी करनी है तो अब फिर से उसे आम जन के दिल में उतरना होगा। युवा वर्ग को नया उद्देश्य देना होगा,नये ख्वाब दिखाने होगे,आम गरीब भारतीय और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के लिए ठोस जमीन की तलाश करनी होगी,उनके दिल में फिर से जगह बनानी होगी। अन्यथा एक ही काठ की हांडी बार-बार आंच पर चढाने पर उसके आग में जलने का खतरा बना रहता है।