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एयर इंडिया की घर वापसी!

डॉ धीरज फूलमती सिंह

वरिष्ठ स्तंभकार

क्या समय और भावना रही होगी जब एयर इंडिया को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया गया था। कहते हैं समाजवाद से प्रेरित नेहरु जी चाहते थे कि उत्पादन और परिवहन ये सरकार के हाथ में रहना चाहिए। उस समय को देखते हुए ये कोई गलत निर्णय भी नहीं था।

तीन हिस्सों में बंट चुके लहुलुहान भारत को अपने पैरों पर खड़ा करना बहुत कठिन काम था। बीसवीं सदी में आकर बचे खुचे भारत को अपना भविष्य तय करना था। एक समकालीन विश्व से कदमताल करता भारत। इसके लिए बड़े स्तर पर पूंजी निवेश की जरूरत थी। कौन करता ये पूंजी निवेश? वो निजी कॉरपोरेट घराने जो लाभ के सिद्धांत पर काम करते हैं?

नहीं। उस समय राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए राष्ट्रीयकरण बहुत जरूरी था। इसलिए नेहरु जी ने जो किया बिल्कुल समय की मांग के अनुकूल किया। लेकिन आज सत्तर साल बाद समय बदल गया। भावनाएं बदल गयीं। तब सरकार व्यापार करना चाहती थी, अब सरकार व्यापार नहीं करना चाहती। इसलिए बीते बीस सालों से एक एक एक करके सरकारी उपक्रम बेचे जा रहे हैं। एयर इंडिया उसमें ताजा नाम जुड़ गया है जिसे टाटा सन्स ने बहुत कम कीमत में खरीद लिया है। आप कह सकते हैं सरकार ने एयर इंडिया को औने पौने दाम में उसी टाटा को दे दिया है जिससे 68 साल पहले खरीदा था।

उद्योगपति टाटा की राय थी कि किसी भी उद्योग का सरकारीकरण नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि जिस किसी भी उद्योग को सरकार अपने नियंत्रण में लेती है, वहां विशेषज्ञों और उद्यमियों की बजाय सरकारी बाबू नीतियां बनाने लगते हैं और उस उद्यम को सफल बनाने की बजाय उनका ध्यान संबंधित मंत्री को खुश रखने और चहेतों की नियुक्तियां करवाने में ज्यादा रहता है।

जेआरडी ने सरकार को विशेष रूप से यह समझाने का भी प्रयास किया कि सड़क निर्माण या रेल जैसे क्षेत्रों की तुलना में हवाई सेवा के क्षेत्र में कम से कम पैंतीस गुना अधिक निवेश की आवश्यकता होती है, इसलिए ऐसे महंगे उद्योग में सरकार को नहीं उलझना चाहिए। उन्होंने उस समय के आंकड़ों देकर भी समझाया कि कोई भी एयरलाइन तभी लाभ कमा सकती है जब इसका विमान कम से कम 2500 घंटे की उड़ान पूरी करे, जबकि तत्कालीन परिस्थितियों में 500 घंटों से अधिक की गुंजाइश नहीं थी।

भारतीय बाजार की स्थिति को देखते हुए उस समय केवल पच्चीस या तीस विमान ही होने चाहिए थे लेकिन अमरीका द्वारा भारतीय बाजार पर सस्ते में खपाए गए विमानों के कारण भारत में आवश्यकता से पांच गुना अधिक विमान आ गए थे। परिणाम यह हुआ कि एकाध कंपनी नहीं, बल्कि पूरा भारतीय हवाई उद्योग ही घाटे में धंस गया। जल्दी ही अंबिका और ज्यूपिटर नामक दो कंपनियों का भट्टा बैठ गया और उन्होंने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया।

रफी अहमद किदवई ने अपनी जिद के चलते हिमालयन एविएशन नाम से जो सरकारी कंपनी बनाई थी, वह भी कुछ ही समय में घाटे में पहुँच गई और उसके बाद से ही उसे चलाने के लिए सरकारी खजाने से धन दिया जाता रहा।

इसके बावजूद भी रूसी समाजवाद के सपनों में खोए नेहरूजी ने नीतियों में कोई बदलाव करने की जरूरत नहीं समझी। लाइसेंस राज जारी रहा और नवंबर 1952 में सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि जल्दी ही हवाई सेवा का सरकारीकरण कर दिया जाएगा।

1953 में नेहरू सरकार ने ‘वायु निगम अधिनियम’ नाम से एक नया कानून बनाया और एयर इण्डिया सहित उस समय की नौ एयरलाइनों का सरकारीकरण कर दिया। निजी एयरलाइन चलाना रातोंरात अपराध बन गया, और ऐसा करने वालों के लिए जुर्माने और सजा का प्रावधान कर दिया गया।

एयर इण्डिया जैसी प्रतिष्ठित एयरलाइन को छीनकर बदले में सरकार ने टाटा को जो मुआवजा दिया, वह भी इतना कम था कि उससे ज्यादा राशि तो एयर लाइन शुरू करते समय टाटा ने विमानों का ईंधन भरवाने के लिए सरकार के पास जमा करवाई थी!

लेकिन यह केवल शुरुआत थी। इसके बाद 1956 में नेहरू सरकार ने इसी प्रकार ‘जीवन बीमा निगम अधिनियम’ बनाकर टाटा की न्यू इण्डिया एश्योरेंस कंपनी सहित देश की 245 जीवन बीमा कंपनियों का सरकारीकरण करके भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) बना दिया।

नेहरू परिवार की अगली पीढ़ी में भी यही परंपरा जारी रही और 1972 में इंदिरा गाँधी ने ‘साधारण बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम 1972’ के द्वारा 100 बीमा कंपनियों का सरकारीकरण कर दिया। इससे पहले 1969 और 1970 में उन्होंने बैंकों का सरकारीकरण किया और 1971 से 1975 के बीच चार चरणों में कोयला खदानों का सरकारीकरण हुआ।

लाभ में चल रहे निजी उद्यमों का जबरन सरकारीकरण करते समय यह दावे किए गए थे कि ये उद्योग जनता को लूटकर मुनाफाखोरी कर रहे हैं और इन पर सरकारी नियंत्रण के द्वारा ही लोगों का भला हो सकता है। लेकिन वास्तव में सरकारीकरण के कारण पूरा नियंत्रण सरकार और मंत्रालयों के पास आ गया और सारे उद्योगों का राजनीतिकरण हो गया।

अब इनमें योग्यता की बजाय मंत्रियों की पसंद और सिफारिश के आधार पर नियुक्तियाँ होने लगीं और व्यावसायिक सूझबूझ की बजाय सरकारी इच्छा के अनुसार नीतियाँ बनने लगीं। इन विभागों के कर्मचारियों का ध्यान भी ग्राहकों को खुश रखने की बजाय सरकारी साहबों को खुश रखने पर केंद्रित हो गया और कुछ गिने-चुने उद्योगों को छोड़कर ऐसे सारे विभाग भ्रष्टाचार और घाटे के बोझ में दबते गए।

नेहरू परिवार की ही तीसरी पीढ़ी के सदस्य राजीव गांधी ने स्वयं ही कहा था कि सरकारी खजाने का 85% हिस्सा भ्रष्टाचार में खा लिया जाता है और आम आदमी को केवल 15% मिलता है। वास्तव में नेहरू और इंदिरा जी की सरकारीकरण की नीति का इस भ्रष्टाचार में मुख्य योगदान था। एयर इण्डिया और बीएसएनएल जैसे उद्यमों की बर्बादी नेहरू परिवार की गलत नीतियों के ही उदाहरण हैं।

नेहरू सरकार ने एयर इण्डिया का सरकारीकरण कर तो दिया, लेकिन उसे चलाने की योग्यता सरकारी लोगों में नहीं थी। इसलिए उन्होंने जेआरडी टाटा से ही आग्रह किया कि वे ही उसे संभालें।

लेकिन अजीब बात यह थी कि सरकार टाटा की कोई सलाह नहीं मानना चाहती थी, उनकी बातों पर कोई ध्यान भी नहीं देना चाहती थी, बल्कि वह चाहती थी कि टाटा उसकी सलाह मानें और उसी हिसाब से एयरलाइन को चलाएं। इसके बावजूद अपने दोस्त नेहरू के आग्रह पर और एयर इण्डिया के प्रति अपने लगाव के कारण जेआरडी टाटा ने वह अनुरोध मान लिया।

1 अगस्त 1953 को सरकार ने एयर इण्डिया को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया और उसी दिन से इस एयरलाइन की कार्यशैली भी बदल गई।

एयर इण्डिया के बोर्ड पर आईएएस अधिकारियों और नौकरशाहों का कब्जा हो गया। बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति सरकारी सिफारिशों और मंत्रियों की मनमर्जी से होने लगी। टाटा के जमाने में बोर्ड की बैठकें एक-दो घंटे चलती थीं और फैसले हो जाते थे, लेकिन अब सरकारी पद्धति के अनुसार बैठकें दो-दो दिनों तक चलने लगीं। सरकारी प्रथा के अनुसार ही हर बैठक के लिए और हर बैठक के बाद 150-150 पन्नों की रिपोर्ट बोर्ड के हर सदस्य के लिए छपवाई जाती थी।

बोर्ड के सदस्य ही मनमाने ढंग से अपने लिए वेतन और भत्ते तय करने लगे, अपने चहेतों और परिवार के लोगों को मुफ़्त यात्राएं करवाने लगे, यहाँ तक कि सरकारी गाड़ियों के ईंधन का खर्चा भी एयर इण्डिया के खाते से ही होने लगा।

बोर्ड के सदस्यों का व्यवहार ऐसा था जैसे यह एयरलाइन राष्ट्र की नहीं, बल्कि उनके घर की निजी संपत्ति है और वे ही उसके मालिक हैं। जेआरडी टाटा ने 1958 में तत्कालीन नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री हुमायूँ कबीर को एक पत्र में ऐसी कई सारी बातों की शिकायत भेजी थी, लेकिन उनकी चिठ्ठी को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।

सरकारी लोगों की ऐसी कार्यशैली के कारण एयर इण्डिया की सेवा का स्तर और उसका मुनाफा दोनों ही लगातार गिरते गए। अगले कुछ वर्षों के दौरान कई दुर्घटनाएं भी हुईं, जिनमें सैकड़ों यात्री मारे गए और एयरलाइन की साख भी गिरी।

सरकारी गड़बड़ी और लापरवाही के बावजूद एयर इण्डिया चलती रही क्योंकि एयरलाइन का संचालन टाटा की प्रशिक्षित टीम के हाथों में था।

लेकिन 1978 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार ने एक दिन अचानक जेआरडी टाटा को चेयरमैन के पद से हटा दिया। बहुत सालों पहले जब मोरारजी मुख्यमंत्री थे, तब एक बार मुंबई की बिजली आपूर्ति के सन्दर्भ में टाटा के साथ उनका विवाद हुआ था। प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही समय बाद मोरारजी ने टाटा से उसका बदला लिया और कीमत देश ने चुकाई।

– समय के साथ द्वारा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ऊडानो को अलग थलग कर दिया गया जिसमें इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया नामक दो विमान कंपनी बनी, आपको जानकर अचरज होगा कि यह दोनों ही कंपनी 2003 तक लाभ कमा रही थी।

किंतु जैसे ही कांग्रेस सरकार सत्ता में आई और प्रफुल्ल पटेल के हाथ में उड्डयन मंत्रालय गया तो इस पूरे लुटेरे राजनीतिक समूह की काली कुटिल व् लालची दृष्टि सफलतापूर्वक लाभ कमा रहे एयर इण्डिया पर गड गई और फिर एयर इण्डिया को लूटने और चूसने का सुनियोजित षड्यंत्र शुरू हो गया।

तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने दोनों ही लाभ कमा रहे निगम इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया को वापस मर्ज कर दिया और अपने ही लोगो द्वारा एक रिपोर्ट बनवाई गई,जिसमें दावा किया गया कि एयर इंडिया विमानों की भीषण कमी से जूझ रही है, किंतु वास्तव में यह स्थिति थी ही नहीं!,

एयर इंडिया को घरेलू ऑपरेशन के लिए मात्र 28 मध्यम आकार के विमान चाहिए थे, परंतु देश की सत्ता लुटेरों के समूह के हाथ में थी और उन्होंने एयर इंडिया की आवश्यकता से कहीं अधिक और बड़ा 68 विमानों का ऑर्डर वह भी वास्तविक कीमतों से कई गुना अधिक दामों पर प्लेस कर दिया, जो 50 हजार करोड़ रुपए का था और क्योंकि इतने बड़े ऑर्डर के लिए एयर इंडिया के खाते में इतनी बडी रकम नहीं थी,तो एक भारी-भरकम लोन उठाया गया और मजेदार बात यह कि जिस लेटेस्ट प्लेन का आर्डर प्लेस किया गया था, वह उस समय तक मात्र डिजाइनिंग फेज में था,यानी उसका डिजाइन केवल कागजों पर था,

अब इतने बड़े लोन का परिणाम यह हुआ की वर्ष दर वर्ष सफलतापूर्वक लाभ कमाते हुए अपने ऑपरेशन चलाने वाला राष्ट्रीय कैरियर बर्बाद हो गया स्थिति यह हो गई कि डेब्ट फ्री एयर इंडिया की बुक पर 40,000 करोड़ का लोन आ गया और क्योंकि एयर इंडिया की कमाई इतनी थी ही नहीं अतः वह यह लोन नहीं चुका सका, अतिरिक्त विमान ऑपरेट तक करने के लिए एयर इंडिया के पास कैश नहीं था, हालत यह थी कि विभिन्न देशों की एयरपोर्ट अथॉरिटीज ने एयर इंडिया को बकाया पेमेंट करने और तेल का पैसा भुगतान करने के लिए रिमाइंडर देने शुरू कर दिया, किंतु एयर इंडिया के पास ना तो इतने पैसे थे ना ही इतनी कमाई हो रही थी कि वह उन लेनदार एयरपोर्ट अथॉरिटी द्वारा दी गई सेवाओं और तेल का भुगतान कर सके,

अंत में ऐसी दुर्दशा भी हुई जब भारत के राष्ट्रीय कैरियर एयर इंडिया को विभिन्न देशों में तेल और अन्य सर्विसेज का भुगतान न कर पाने के कारण वहां स्थित उसके एसेट्स जप्त कर लिए जाने और फ्लाइट ऑपरेशन सीज कर दिए जाने की धमकियां मिलीं, तब कई बार नरेंद्र मोदी की भारत सरकार ने एयर इंडिया को हम और आप जैसे आम करदाता द्वारा चुकाए गए कर के पैसों का इस्तेमाल कर एयर इंडिया को अपने ऑपरेशन चलाने योग्य धन उपलब्ध कराया।

परंतु इतनी जदो जहद के बाद भी एयर इंडिया की वित्तीय स्थिति नहीं सुधरी,सुधरती भी कैसे?कर्ज अधिक था और कमाई कम,ऑपरेशन सर्वसेज़, तेल और ऋण पैसा तो छोड़िए सामान्य ऑपरेशन चलाने और इंटरेस्ट तक चुकाने के पैसे नहीं थे। बड़ी मुश्किल से कर्मचारियो की तनख्वाह दी जा रही थी,सरकार की कमर टूट चुकी थी,वह समझ चुकी थी कि बार-बार करदाताओ का पैसा इस्तेमाल करके और एयर इंडिया को फंड करना जलती आग में पैसे डालने के समान है। तब अंत में जाकर सरकार ने बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लिया कि एयर इंडिया का निजीकरण ही उचित है।

देखा जाए तो निजीकरण की जरूरत एकदम से नहीं हुई। सरकारीकरण ने जितना लाभ दिया उससे ज्यादा नुकसान किया। हर सरकारी उपक्रम को दुधारु गाय की तरह दुहा गया जिसमें एयर इंडिया भी शामिल है। आज एयर इंडिया पर 53 हजार करोड़ का कर्ज है जिसका एक हिस्सा 15 हजार करोड़ टाटा चुकाएगा बाकी सरकार एयर इंडिया के संपत्तियां बेचकर चुकाएगी।

खैर, उस समय अगर वो सही था तो इस समय ये सही है। कौन जाने कल को समय बदले तो एक बार फिर सरकारीकरण ही सही लगने लगे?

और अब जिस ग्रुप ने एयर इंडिया की स्थापना की थी 68 वर्ष बाद यह एयरलाइंस उसी ग्रुप के हाथों में जा रहा है अर्थार्थ चक्र पूरा हुआ जिसकी चीज थी पुनः उसी के पास पहुंच गई,यानी एयर इण्डिया की घर वापसी हो चुकी है।